होम -
उद्योग -
मेन बॉडी -

WikiFX एक्सप्रेस

Exness
TMGM
EC markets
XM
FXTM
FOREX.com
AVATRADE
GTCFX
IC Markets Global
D prime

ऑटोमेटिक टॉयलेट और वाटर एटीएम से स्मार्ट बनते स्लम

WikiFX
| 2019-02-13 15:38

एब्स्ट्रैक्ट:इमेज कॉपीरइटGetty Imagesशहरीकरण की वजह से दुनिया भर के शहरों में स्लम (झुग्गी-झोपड़ियों वाली बस्तिया

इमेज कॉपीरइटGetty Image

शहरीकरण की वजह से दुनिया भर के शहरों में स्लम (झुग्गी-झोपड़ियों वाली बस्तियां) तेज़ी से फैल रही हैं. माना जाता है कि आज दुनिया की एक अरब आबादी झुग्गियों मे रहती है और इनकी हालत बेहद ख़राब है.

जाने-माने लेखक चार्ल्स डिकेंस ने न्यूयॉर्क के मशहूर या यूं कहें कि बदनाम झुग्गी 'फ़ाइव प्वाइंट्स' के बारे में लिखा था कि, 'ये एक तरह का चौकोर मकानों का कोण है.' ये बात 1842 की है, तब फ़ाइव प्वाइंट्स की झुग्गी बीमारियों, जुर्म और न जाने कितनी बुराइयों का अड्डा मानी जाती थी. बाद में उस बस्ती को नेस्तनाबूद कर दिया गया. आज उसकी जगह न्यूयॉर्क के बेहद महंगे मकान बना दिए गए हैं.

जब से दुनिया में शहरीकरण बढ़ा, तब से इनसे निपटने का एक ही तरीक़ा आज़माया जाता रहा है, वो है इनको उजाड़ना और इनकी जगह बेहतर सुविधाएं या मकान बनाना. जैसे कि फ़ाइव प्वाइंट्स स्लम की जगह पार्क, सरकारी इमारतें और निजी मकान बना दिए गए.

पढ़ें- झुग्गी के बच्चों को संगीत सीखा रहे हैं रहमान

वैसे, इन झुग्गियों के उजाड़ने से किसी को क्या दिक़्क़त होगी. लेकिन, स्लम से निपटने के इस तरीक़ों से एक बड़ा सवाल उठता है, वो ये कि इन बस्तियों में रहने वाले कहां जाएंगे?

न्यूयॉर्क की झुग्गी 'फ़ाइव प्वाइंट्स' से जब हज़ारों झुग्गियां उजाड़ी गईं, तो उनकी जगह अदालत की इमारतें और पार्क बना दिए गए. लेकिन, सरकार के इस क़दम से उज़ड़े लोगों के लिए कोई योजना ही नहीं थी.

इमेज कॉपीरइटGetty ImagesImage caption झुग्गियों की हालत भी बेहतर की जा सकती है ताकि वो रहने के लिए एक बेहतर जगह बन सके.

जिस तरह से आज लोग शहरों की तरफ़ भाग रहे हैं और जलवायु परिवर्तन की वजह से भगदड़ मची है, उससे तय है कि दुनिया में झुग्गी-बस्तियों की तादाद बढ़ेगी.

हाल ही में अफ्रीकी देश कीनिया के सबसे बड़े स्लम एरिया किबेरा को उजाड़ दिया गया. इससे 20 हज़ार लोग बेघर हो गए.

अब हर झुग्गी बस्ती को उजाड़ा तो नहीं जा सकता. फिर, इनमें आबाद लोगों को बेहतर ज़िंदगी देने का तरीक़ा क्या है?

ऐसे में अब झुग्गियों को ही बेहतर बनाने का नया दौर है. दुनिया के कई शहरों में ऐसे प्रयोग हो रहे हैं, जिनसे झुग्गियों में रहने वालों की ज़िंदगी को बेहतर बनाया जा रहा है.

झुग्गी बस्तियों में सड़कें बनाई जा रही हैं. पीने के पानी की पाइपलाइन बिछाई जा रही है. मज़बूत मकान बनाए जा रहे हैं. लोगों को अपने मकान बनाने की इजाज़त दी जा रही है. उनकी बीमारियों के इलाज के लिए बेहतर सुविधाएं स्लम तक पहुंचाई जा रही हैं. इन तरीक़ों से झुग्गियों को आज किसी दूसरी बस्ती जैसा बनाने की कोशिश की जा रही है.

इमेज कॉपीरइटAFPझुग्गियों और त्रासदी

ब्रिटेन की मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी में शहरीकरण की एक्सपर्ट डायना मिटलिन कहती हैं कि, 'स्लम असुरक्षित और अस्थायी ज़िंदगी के प्रतीक हैं. लेकिन, उनमें ज़िंदगी स्थायी रूप से आबाद रहती है. बहुत से लोग ऐसे हैं जो 40 बरस से स्लम में रहते आए हैं. ऐसे में आज ये सोच उभरी है कि हमें उनकी मदद करनी चाहिए.'

ये दान से कल्याण का मामला नहीं है. झुग्गियों में रहने वाले लोग ग़रीब भले हों, मगर उनसे भी कुछ कमाई हो सकती है. आख़िर आज दुनिया का हर सातवां इंसान झुग्गियों का बाशिंदा है. अब कारोबार जगत के कई लोग झुग्गियों में रहने वालों की ज़िंदगी बेहतर बनाने में अपने लिए मुनाफ़ा तलाश रहे हैं.

पढ़ें- झुग्गी के जीवन में रंग भरती कला

अब शौचालय को ही ले लीजिए. आम तौर पर किसी भी झुग्गी बस्ती के साथ बड़ी चुनौती ये होती है कि वो शहरों की बुनियादी सुविधाओं से वंचित होती हैं. वहां, सीवर लाइन नहीं होती. पीने के पानी की लाइन नहीं होती. बिजली के तार नहीं पहुंचे होते.

ऑटोमेटिक टॉयलेटकी एक नई कोशिश

मुंबई के मयंक मिढा झुग्गियों में ही पले बढ़े. मयंक कहते हैं कि, 'झुग्गियों में बड़े होते हुए मैंने शौचालयों की भारी कमी देखी है.' मयंक शुरू से इसे बदलने के लिए कुछ करना चाहते थे. उन्हें एक मौक़ा साल 2014 में मिला. इस वक्त वो एक टेलीकॉम कंपनी में काम कर रहे थे. एक दिन काम करते हुए उनकी नज़र एक टॉवर के नीचे लगने वाले मेटल बॉक्स पर पड़ी. उन्हें लगा कि ये तो शानदार शौचालय का काम कर सकता है.

लेकिन, वो सिर्फ़ एक शौचालय भर हो, इससे काम नहीं चलने वाला था. पहले भी झुग्गियों में थोड़े-बहुत शौचालय हुआ करते थे. लेकिन, उनकी देख-रेख ठीक से नहीं होती थी. अक्सर उन्हें तोड़-फोड़ डाला जाता था. मयंक बताते हैं कि, 'हम ने सोचा कि हम अगर इस शौचालय को ऑटोमैटिक बना दें और इसकी निगरानी करें, तो हम इन चुनौतियों से पार पा सकते हैं.'

इसके बाद मयंक ने 'गर्व टॉयलेट्स' नाम की संस्था की शुरुआत की.

कई साल की कोशिश के बाद उनकी कंपनी ने गर्व टॉयलेट नाम का शौचालय विकसित किया है. इसे तोड़ा-फोड़ा नहीं जा सकता. इन शौचालयों में सेंसर और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरण लगे हैं. इससे शौचालय इस्तेमाल होने पर फ़ौरन फीडबैक मिलता है. किसी ने फ्लश नहीं चलाया तो पता चल जाता है. या किसी ने हाथ नहीं धोए तो उसकी ख़बर भी हो जाती है.

पढ़ें- वीडियो झुग्गी बस्तियों में कितनी सुरक्षित हैं महिलाएं-

अब मयंक मिढा ने देश भर में ऐसे कई शौचालय लगाए हैं. वो अब इन्हें अफ्रीकी देश घाना में भी स्थापित करने जा रहे हैं. घाना की ज़्यादातर आबादी स्लम में ही रहती है. जहां लोग बुनियादी सुविधाओं से महरूम हैं.

मुनाफ़े की तलाश में जुटे कारोबारियों और ग़रीबों और सुविधाओं से वंचित लोगों के बीच तालमेल में अपार संभावनाएं हैं.

एक हक़ीक़त ये है कि आप दान के भरोसे कल्याण की उम्मीद नहीं कर सकते. मसलन, अमरीका की ट्रम्प सरकार ने 2017 में दूसरे देशों को दी जाने वाली मदद में 32 फ़ीसद की कटौती का एलान किया था. इसी तरह ब्रितानी सरकार ने विकासशील देशों की मदद में ख़र्च की जाने वाली रक़म में कटौती की चेतावनी दी है.

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा

कैसा हो सपनों का घर

स्लम के साथ दूसरी बड़ी चुनौती ये है कि यहां बड़ी तादाद में लोग रहते हैं. मयंक मिढा कहते हैं, ''आज दुनिया के चार अरब लोगों तक बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंची हैं. उनके नहाने-धोने और शौच की सुविधाओं की भारी कमी है. अब अगर इन्हें मदद देने के लिए अमीर देशों से मिलने वाली रक़म के भरोसे रहा जाए, तो स्लम का उद्धार होने से रहा.''

गर्व टॉयलेट में कुछ पैसा भारत सरकार देती है. वहीं कुछ पैसा इसे इस्तेमाल करने वालों से मिलता है. हर बार इस्तेमाल करने वालों को कुछ पैसे देने होते हैं. इसके अलावा विज्ञापन से भी कमाई हो जाती है. सामुदायिक सेवा केंद्रों के क़रीब लगाए जाने वाले गर्व शौचालयों पर विज्ञापन से प्रचार भी किया जाता है.

झुग्गियों में पानी के एटीएम

झुग्गी-बस्तियों में पीने के साफ़ पानी की भारी कमी होती है. अक्सर इन बस्तियों में पीने के पानी की पाइपलाइन नहीं होती.

डायना मिटलिन कहती हैं कि, 'पहले तो किसी भी झुग्गियों तक पाइप लाइन पहुंचानी होगी. फिर अगर आप घर-घर पानी का कनेक्शन नहीं दे सकते, तो, ऐसा ठिकाना बनाना होगा, जहां आकर लोग अपनी ज़रूरत भर का पानी ले लें. ठीक वैसे ही जैसे प्रीपेड मीटर से बिजली सप्लाई होती है. या फिर पैसे देकर लोग टोकन ले लें और उस टोकन से पानी हासिल करें.'

पढ़ें- 'तेजाब जैसा पानी आता है, केजरीवाल यहां आकर देखें'

झुग्गियों तक ऐसी ही सुविधा पहुंचाने का काम कर रही है डेनमार्क की कंपनी ग्रन्डफोस. 2015 में ग्रन्डफोस ने कीनिया की राजधानी नैरोबी की सिटी वाटर ऐंड सीवरेज कंपनी के साथ क़रार किया था. इसके तहत पानी के एटीएम के ज़रिए स्लम में पीने का पानी पहुंचाया जाता है.

इमेज कॉपीरइटGetty ImagesImage caption पानी के एटीएम

पहले नैरोबी की झुग्गी बस्तियों के लोग हाथ गाड़ी से पहुंचाया जाने वाला पानी ही ख़रीद पाते थे. ये महंगा पड़ता था. और ये पानी सुरक्षित था, इसकी गारंटी भी कोई नहीं ले सकता था. अक्सर टूटे हुए पाइप से छोटे ड्रमों और कैन में भरकर बस्तियों में पानी बेचा जाता था.

दिल्ली में भी इसकी मिसाल देखने को मिलती है. माना जाता है कि ये इतना मुनाफ़े का धंधा है कि बाक़ायदा पानी माफ़िया इस धंधे में सक्रिय है.

पढ़ें- ब्राज़ील की झुग्गियां ग़रीबों के लिए हुई महँगी

अब डेनमार्क की कंपनी ग्रन्डफोस ने नैरोबी की झुग्गी बस्तियों में पानी वाले एटीएम लगाए हैं. इनमें डिजिटल डैशबोर्ड होता है. ठीक वैसा है ही जैसा किसी पेट्रोल पंप में होता है. इनमें टोकन या पैसा डालने पर तय तादाद में पानी निकलता है. लोग स्मार्ट कार्ड के ज़रिए भी पानी ख़रीद सकते हैं. इस स्मार्ट कार्ड को रिचार्ज भी कराया जा सकता है.

इसके अलावा कई कंपनियां मलिन बस्तियों में बिजली और इंटरनेट जैसी सुविधाएं भी पहुंचा रही हैं और इनके बदले में कमाई कर रही हैं.

स्वास्थ्य सेवाओं की कमी

दुनिया की ज़्यादातर आबादी के पास आपातकालीन और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचने का ज़रिया नहीं है. केन्या को ही लीजिए. यहां हर 6355 लोगों पर सिर्फ़ एक डॉक्टर है. ऐसे में कई कंपनियां ख़ुद की तीमारदारी वाली सुविधाएं भी झुग्गी बस्तियों तक पहुंचा रही हैं. इनमें आग लगने पर अलार्म की सुविधा से लेकर, घर में बच्चे पैदा करने को मजबूर महिलाओं के लिए किट तक शामिल हैं.

डायना मिटलिन कहती हैं कि, 'मेरा मानना है कि बदलाव हो रहा है. शहरों को मज़दूरों की ज़रूरत है. ये मज़दूर और कामगार अक्सर झुग्गियों में ही रहते हैं. जहां पर मज़दूरी कम है, वहां तो लोगों के पास विकल्प ही नहीं होता. लेकिन, अब कुछ कारोबारियों और नयी सोच रखने वालों की वजह से स्लम के लोगों की ज़िंदगी बेहतर हो रही है. वो अब छोटी सी झोपड़ी में भी अच्छी ज़िंदगी जी सकते हैं.'

WikiFX एक्सप्रेस

Exness
TMGM
EC markets
XM
FXTM
FOREX.com
AVATRADE
GTCFX
IC Markets Global
D prime

WikiFX ब्रोकर

FXTM

FXTM

विनियमित
ATFX

ATFX

विनियमित
XM

XM

विनियमित
FXCM

FXCM

विनियमित
STARTRADER

STARTRADER

विनियमन के साथ
EBC FINANCIAL GROUP

EBC FINANCIAL GROUP

विनियमन के साथ
FXTM

FXTM

विनियमित
ATFX

ATFX

विनियमित
XM

XM

विनियमित
FXCM

FXCM

विनियमित
STARTRADER

STARTRADER

विनियमन के साथ
EBC FINANCIAL GROUP

EBC FINANCIAL GROUP

विनियमन के साथ

WikiFX ब्रोकर

FXTM

FXTM

विनियमित
ATFX

ATFX

विनियमित
XM

XM

विनियमित
FXCM

FXCM

विनियमित
STARTRADER

STARTRADER

विनियमन के साथ
EBC FINANCIAL GROUP

EBC FINANCIAL GROUP

विनियमन के साथ
FXTM

FXTM

विनियमित
ATFX

ATFX

विनियमित
XM

XM

विनियमित
FXCM

FXCM

विनियमित
STARTRADER

STARTRADER

विनियमन के साथ
EBC FINANCIAL GROUP

EBC FINANCIAL GROUP

विनियमन के साथ

रेट की गणना करना

USD
CNY
वर्तमान दर: 0

रकम

USD

उपलब्ध है

CNY
गणना करें

आपको शायद यह भी पसंद आएगा

Golden River

Golden River

Aggregate Trading

Aggregate Trading

Golden River Holding

Golden River Holding

GROWTH GRID

GROWTH GRID

CW-MANAGEMENT

CW-MANAGEMENT

CAPITAL GROUP COMPANY

CAPITAL GROUP COMPANY

BARCLAY VALNOR

BARCLAY VALNOR

ARBION SWIFT

ARBION SWIFT

Golden Hen Securities and Futures

Golden Hen Securities and Futures

EMS BROKERS

EMS BROKERS