होम -
उद्योग -
मेन बॉडी -

WikiFX एक्सप्रेस

Exness
XM
TMGM
EC markets
AVATRADE
FXTM
FOREX.com
IC Markets Global
FXCM
STARTRADER

किसान आंदोलन: क्या सरकार और किसानों के बीच सुलह का कोई ‘फ़ॉर्मूला’ है?

WikiFX
| 2020-12-07 12:30

एब्स्ट्रैक्ट:BBC News, हिंदीसामग्री को स्किप करेंसेक्शनहोम पेजकोरोनावायरसभारतविदेशमनोरंजनखेलविज्ञान-टेक्नॉलॉजीसोश

BBC News, हिंदीसामग्री को स्किप करेंसेक्शनहोम पेजकोरोनावायरसभारतविदेशमनोरंजनखेलविज्ञान-टेक्नॉलॉजीसोशलवीडियोहोम पेजकोरोनावायरसभारतविदेशमनोरंजनखेलविज्ञान-टेक्नॉलॉजीसोशलवीडियोकिसान आंदोलन: क्या सरकार और किसानों के बीच सुलह का कोई ‘फ़ॉर्मूला’ है?सरोज सिंहबीबीसी संवाददाता29 मिनट पहलेएक तरफ़ नए कृषि क़ानून वापस लेने के फ़ैसले पर किसान संगठन के नेताओं ने सरकार से 'हाँ' और 'ना' में जवाब माँगा है. किसान नए कृषि क़ानून वापस लेने की माँग पर अड़े हुए हैं. उससे कम पर वो कोई समझौता करने को तैयार नहीं हैं. दूसरी तरफ़ केंद्र सरकार के मंत्री न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी पर किसानों को लिखित में आश्वासन देने के साथ साथ कई दूसरी माँगें मानने को तैयार है. लेकिन केंद्र सरकार अब भी नए कृषि क़ानून वापस लेने के मूड में नहीं दिख रही.ऐसे में किसान और सरकार के बीच का गतिरोध कैसे दूर हो? इस सवाल का जवाब जानने के लिए बीबीसी ने बात की पूर्व कृषि मंत्री, फ़ूड कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया के पूर्व चेयरमैन, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फ़ूड कमिश्नर और कृषि से लंबे समय से जुड़े जानकारों से. आइए जानते हैं, छठे दौर की बातचीत से पहले क्या हैं उनके सुझाव. PM मोदी तक पहुँची महाराष्ट्र के किसान की अधूरी 'मन की बात'छोड़कर और ये भी पढ़ें आगे बढ़ेंऔर ये भी पढ़ेंकिसान आंदोलन: 'मन की बात' से मशहूर हुए महाराष्ट्र के किसान की प्रधानमंत्री मोदी ने सुनी 'अधूरी बात' किसान आंदोलन: MSP पर माँग मान क्यों नहीं लेती मोदी सरकार? जानिए क्या है वजहेंकृषि बिल: न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर डरे हुए क्यों हैं किसान?किसान आंदोलन: आरएसएस से जुड़े संगठनों को भी एमएसपी पर कोई बरगला रहा है?समाप्तकिसान आंदोलन: MSP पर माँग मान क्यों नहीं लेती मोदी सरकार?सोमपाल शास्त्री, पूर्व कृषि मंत्री सोमपाल शास्त्री वाजपेयी सरकार में कृषि मंत्री रह चुके हैं. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने बहुत ही सरल शब्दों में समाधान सुझाया है.“ये जो तीन क़ानून सरकार ले कर आई है, ये कोई नई बात नहीं है. इसकी औपचारिक सिफ़ारिश पहली बार भानू प्रताप सिंह की अध्यक्षता में बनी कमेटी ने 1990 में की थी. तब से ये लंबित पड़ी थीं. वर्तमान सरकार ने इसे लागू किया है. इसे लागू करने पर लाभ भी हो सकता है और हानी भी हो सकती है. लाभ केवल तब हो सकता है जब इसके साथ कुछ सहकारी सहयोगी व्यवस्थाएँ कर दी जाएँ. इसके लिए सबसे पहले ज़रूरी है न्यूनतम समर्थन मूल्य को एक गारंटी के तौर पर किसानों के लिए वैधानिक अधिकार बनाया जाए.दूसरा, जो कृषि लागत और मूल्य आयोग है उसे संवैधानिक संस्था का दर्जा दिया जाए. साथ ही इस आयोग का जो फ़सल लागत आंकलन का तरीक़ा है उसको औद्योगिक लागत के आधार पर संशोधित किया जाए. और तीसरा ये कि जो अनुबंध खेती यानी कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग से ऊपजने वाले विवाद हैं उनके लिए ब्लॉक स्तर से लेकर जनपद स्तर, राज्य स्तर और केंद्र स्तर पर अलग ट्रिब्यूनल बने, जिनको न्यायिक अधिकार मिले. यदि इन तीनों व्यवस्थाओं को क़ानून में संशोधित करके लागू किया जाता है तब तो इन क़ानूनों से किसानों को लाभ होगा वर्ना नहीं होगा. इन क़ानूनों को मेरा सपोर्ट है लेकिन ऊपर लिखे संशोधनों के साथ. अगर सरकार ऐसा करने के लिए तैयार हो जाती है उसके बाद हमारे जैसे किसी व्यक्ति को किसानों से बात करके समझाने की ज़रूरत पड़ेगी, ताकि किसान को किसान की भाषा में समझाया जा सके. वर्तमान सरकार के पास इस निष्ठा का कोई आदमी नहीं है जो किसान के धरातल से लेकर नीति निर्धारण के सर्वोच्च स्तर की बात को समझे. आलोक सिन्हा, पूर्व चेयरमैन, फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडियाआलोक सिन्हा 2005 से 2006 तक केंद्रीय कृषि मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव के पद पर भी रहे हैं. वो पूरे मामले का बिलकुल अलग तरीक़े का समाधान सुझाते हैं. ”किसानों के एमएसपी ख़त्म होने की आशंका बिलकुल जायज़ नहीं है. ऐसा इसलिए क्योंकि जब से राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम क़ानून पास हुआ है तब से हर साल केंद्र सरकार को 400-450 लाख टन गेंहू और चावल की आवश्यकता रहती ही है. इसके अलावा सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस), सेना के लिए, और ओपन मार्केट में दाम को रेगुलेट करने के लिए केंद्र सरकार अनाज ख़रीदती है. इसलिए अगले दस साल तक मुझे नहीं लगता एमएसपी ख़त्म होने वाली है. लेकिन धीरे-धीरे सरकार ने ऐसी ख़रीद कम की है, इस वजह से ये आशंका पैदा हो रही है. भारत में ग्रामीण इलाक़े में जो किसान हैं, उनमें से 50 फ़ीसद के पास ज़मीन नहीं है. ऐसे किसान इस आंदोलन का हिस्सा इसलिए नहीं हैं. बाक़ी के 50 फ़ीसद में से 25 फ़ीसद के पास एक एकड़ से कम की ज़मीन है. वो कहीं अपनी फ़सल बेच ही नहीं पाते. उसको एमएसपी का पता ही नहीं है. बाक़ी बचे 25 फ़ीसद किसानों में केवल 10 फ़ीसद ही ऐसे होंगे, जो एमएसपी वाली फ़सलें मार्केट में बेचने लायक़ पैदा करते होंगे. शांता कुमार कमेटी ने कहा है कि केवल छह फ़ीसद ही देश में ऐसे किसान हैं. मैं बढ़ा कर 10 फ़ीसद कह रहा हूँ. इसलिए मेरी समझ से इस समस्या का समाधान ये है कि पंजाब हरियाणा के किसानों को दूसरी फ़सल (शाक- सब्ज़ी, दूसरे दहलन) उगाने के लिए केंद्र सरकार को प्रेरित करना चाहिए और उनको प्रोत्साहित करना चाहिए. पंजाब में धान की खेती इतनी ज़्यादा हो रही है क्योंकि सब एमएसपी पर फ़सल बिक जाती है. लेकिन इस वजह से वहाँ का जल स्तर काफ़ी नीचे चला गया है. ये पंजाब के हित में नहीं है. लेकिन आज के दिन पंजाब के किसानों को भरोसा नहीं है कि दूसरी फ़सल उगाएंगें तो उन्हें बाज़ार में उचित मूल्य मिलेगा. सरकार को किसानों को इसके लिए मनाना होगा. उसके लिए नए स्कीम बनाने होंगे. इससे किसानों की आय भी दोगुनी होगी और सरकार को धान, गेंहू अतिरिक्त मात्रा में ख़रीदना भी नहीं होगा.“देवेंद्र शर्मा, कृषि विशेषज्ञ ”फ़िलहाल चाहे किसान हो या केंद्र सरकार - दोनों पक्ष अपने-अपने पक्ष को लेकर खड़े हैं. इसलिए बड़ा दिल सरकार को दिखाने की ज़रूरत है. लेकिन मेरी समझ से एक समाधान ये हो सकता है कि सरकार एक चौथा बिल या नया क़ानून लेकर आए, जो ये कहे कि न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे ख़रीद नहीं होगी. इससे किसानों को न्यायिक अधिकार मिल जाएगा. ऐसा करने से सरकार को तीनों बिल वापस नहीं लेने होंगे. इससे दोनों पक्षों की बात भी रह जाएगी. कृषि क्षेत्र में भारत में बहुत दिक्क़तें हैं, इसमें सुधार लाने की ज़रूरत है. लेकिन सुधार का मतलब ये नहीं किसी भी क्षेत्र का निजीकरण कर दो. किसान आंदोलन की एक मूल माँग ये है कि किसान को एक निश्चित आय चाहिए. इसको आप कोई भी नाम दे दें. चाहे न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी (एमएसपी) की माँग हो या फिर किसान सम्मान निधि के रूप में हो. लेकिन किसानों की निश्चित आय की समस्या को दूर करने के लिए ज़रूरत है कि एमएसपी और किसान सम्मान निधि जैसी दोनों व्यवस्था साथ साथ चले, ना कि दोनों में से कोई एक. एमएसपी केवल 23 फ़सलों पर मिलती है जो 80 फ़ीसद फ़सलों को कवर करती है. सरकार अगर एमएसपी पर फ़सलों की ख़रीद को संवैधानिक अधिकार भी बना देती है (एक अलग बिल ला कर) तो देश के 40 फ़ीसद किसान के पास बेचने के लिए कुछ नहीं होगा, क्योंकि वो छोटे किसान हैं. इसलिए उस खाई को भरने के लिए सरकार को छोटे किसानों के लिए ज़्यादा से ज़्यादा किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं की ज़रूरत पड़ेगी.“ एनसी सक्सेना, पूर्व फ़ूड कमिश्नर, सुप्रीम कोर्टएनसी सक्सेना प्लानिंग कमिशन के पूर्व सचिव भी रह चुके हैं. उनके मुताबिक़ मामला सरकार के हाथ से अब निकल चुका है, लेकिन एक ऐसा समाधान है जिससे दोनों पक्षों की बात रह जाएगी और विवाद भी सुलझ जाएगा. ”अब दोनों पक्षों के लिए ये नए कृषि क़ानून अहम का सवाल हो गया है और क़ानून व्यवस्था का सवाल भी बनता जा रहा है. किसानों को लगता है कि वो दिल्ली रोकने में समर्थ हो जाएँगे और सरकार से अपनी बात मनवा लेंगे. केंद्र सरकार भी क़ानून वापस लेने के मूड में नहीं है. केंद्र सरकार ने शुरुआत में थोड़ी सी ग़लती ये कर दी. उन्हें नए कृषि क़ानून बनाते समय एक क्लॉज़ डाल देना चाहिए था कि ये क़ानून अमल में उस तारीख़ से आएगा जब उसका नोटिफ़िकेशन जारी होगा, जो हर राज्य के लिए अलग भी हो सकता है. और राज्यों सरकारों पर ये बात छोड़ देते कि वो कब से अपने राज्य में इस क़ानून को लागू करना चाहते है. इससे सारी समस्या ही हल हो जाती. पंजाब हरियाणा के अलावा बाक़ी राज्यों में जब ये लागू होता और उससे वहाँ के किसानों को फ़ायदा होता तो पंजाब के किसान ख़ुद इसे लागू करने को कहते.समस्या ये है कि पंजाब-हरियाणा में किसानों की हालत बाक़ी राज्यों के किसानों से बहुत अलग है. सरकार अब भी चाहे तो ऐसा प्रावधान क़ानून में जोड़ सकती है और क़ानून को वापस ना लेते हुए राज्य सरकारों पर छोड़ दे कि वो कब और कैसे इसे लागू करना चाहती है. वैसे अब देर हो चुकी है. मुझे लगता नहीं कि किसान मानेंगे, पर ये वो बीच का रास्ता है जिससे दोनों की बात रह जाएगी. ऐसा करने पर केंद्र सरकार को भी कोई नुक़सान नहीं होगा. केंद्र सरकार जिन कृषि सुधार की बात कर रही है वो इससे पूरे भी हो जाएँगे. कृषि बिल: क्या किसानों का हक़ मार लेंगे बड़े उद्योगपति?किसानों का कल भारत बंद, जानिए इससे जुड़ी ख़ास और बड़ी बातें (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)संबंधित समाचार#FarmersProtest: सिंघु बॉर्डर से हिलने को राज़ी नहीं है किसान, पहले बातचीत की माँग28 नवंबर 2020#FarmersProtest पर बोले अमित शाह, किसानों का प्रदर्शन राजनीतिक नहीं29 नवंबर 2020टॉप स्टोरीक्या सरकार और किसानों के बीच सुलह का कोई ‘फ़ॉर्मूला’ है?29 मिनट पहलेलाइव 'अदानी-अंबानी कृषि क़ानून' वापस लो: राहुल गांधीमहबूबा मुफ़्ती बोलीं- ‘अभी भी मेरी आवाज़ दबाने की कोशिशें जारी हैं’57 मिनट पहलेज़रूर पढ़ेंकिसान आंदोलन: वे 5 हस्तियां जिनके नाम पर बने प्रदर्शन स्थल6 दिसंबर 20201:59वीडियो, किसान आंदोलन: मरने वाले किसान के घर में मातम, अवधि 1,596 दिसंबर 2020किसान आंदोलन के बारे में क्या कहते हैं मुख्यमंत्री खट्टर के गांववाले4 दिसंबर 2020किसान आंदोलनः क्यों टूट रहा है मीडिया के प्रति भरोसा4 दिसंबर 2020मुसलमान समुदाय में एक से अधिक शादी को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती5 दिसंबर 20202:02वीडियो, किसानों के समर्थन में फिर बोले कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो, अवधि 2,025 दिसंबर 20203:30वीडियो, बीजेपी नेता किसान आंदोलन को लेकर क्या कह रहे हैं?, अवधि 3,305 दिसंबर 20203:59वीडियो, महाराष्ट्र: सरकारी स्कूल के टीचर रणजीत डिसले को ग्लोबल टीचर पुरस्कार, अवधि 3,595 दिसंबर 2020कहां ‘ग़ायब’ हैं जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने वाले तमिलनाडु के किसान5 दिसंबर 2020सबसे अधिक पढ़ी गईं1हैदराबाद क्या वाक़ई पहले भाग्यनगर था? जानिए इतिहास2गुजरात: दलित युवक को कथित ऊंची जाति जैसा सरनेम रखने की वजह से पीटा3अमीश देवगन के ख़िलाफ़ FIR रद्द करने से SC का इनकार4आंध्र प्रदेश में रहस्यमयी बीमारी से एक की मौत, 400 से ज़्यादा लोग अस्पताल में भर्ती5महबूबा मुफ़्ती बोलीं- ‘अभी भी मेरी आवाज़ दबाने की कोशिशें जारी हैं’6सऊदी अरब के प्रिंस इसराइली विदेश मंत्री पर जमकर बरसे7किसानों का कल भारत बंद, जानिए इससे जुड़ी ख़ास और बड़ी बातें8मुस्लिम-हिन्दू जोड़े को बजरंग दल ने रोका, लड़के को भेजा गया जेल961 साल की दादी ने अपनी ही पोती को दिया जन्म, जानिए कैसे10क्लासरूम में दो नाबालिग़ों ने की शादी, मांग भरने का वीडियो वायरलBBC News, हिंदीआप बीबीसी पर क्यों भरोसा कर सकते हैंइस्तेमाल की शर्तेंबीबीसी के बारे मेंनिजता की नीतिकुकीज़बीबीसी से संपर्क करेंAdChoices / Do Not Sell My Info© 2020 BBC. बाहरी साइटों की सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है. बाहरी साइटों का लिंक देने की हमारी नीति के बारे में पढ़ें.

WikiFX एक्सप्रेस

Exness
XM
TMGM
EC markets
AVATRADE
FXTM
FOREX.com
IC Markets Global
FXCM
STARTRADER

WikiFX ब्रोकर

FXTM

FXTM

विनियमित
ATFX

ATFX

विनियमित
XM

XM

विनियमित
FXCM

FXCM

विनियमित
DBG MARKETS

DBG MARKETS

विनियमन के साथ
BCR

BCR

विनियमन के साथ
FXTM

FXTM

विनियमित
ATFX

ATFX

विनियमित
XM

XM

विनियमित
FXCM

FXCM

विनियमित
DBG MARKETS

DBG MARKETS

विनियमन के साथ
BCR

BCR

विनियमन के साथ

WikiFX ब्रोकर

FXTM

FXTM

विनियमित
ATFX

ATFX

विनियमित
XM

XM

विनियमित
FXCM

FXCM

विनियमित
DBG MARKETS

DBG MARKETS

विनियमन के साथ
BCR

BCR

विनियमन के साथ
FXTM

FXTM

विनियमित
ATFX

ATFX

विनियमित
XM

XM

विनियमित
FXCM

FXCM

विनियमित
DBG MARKETS

DBG MARKETS

विनियमन के साथ
BCR

BCR

विनियमन के साथ

रेट की गणना करना

USD
CNY
वर्तमान दर: 0

रकम

USD

उपलब्ध है

CNY
गणना करें

आपको शायद यह भी पसंद आएगा

Equitas

Equitas

EQUINOX

EQUINOX

FX Option Trade247

FX Option Trade247

GLEVOR CAPITAL

GLEVOR CAPITAL

Wanda Bullion

Wanda Bullion

fortune Securities

fortune Securities

Leighton Futures

Leighton Futures

BEFLIX

BEFLIX

Dacland Forex

Dacland Forex

BCI

BCI