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राहुल गांधी की घोषणा ज़मीन पर कामयाब हो पाएगी- लोकसभा चुनाव 2019

WikiFX
| 2019-03-26 12:57

एब्स्ट्रैक्ट:इमेज कॉपीरइटGetty Imagesकांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा है कि अगर उनकी सरकार सत्ता में आई तो सबस

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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा है कि अगर उनकी सरकार सत्ता में आई तो सबसे ग़रीब 20 प्रतिशत परिवारों को सालाना 72,000 रुपए दिए जाएंगे.

लेकिन जब उनसे ये पूछा गया कि इस योजना के लिए पैसे कहां से आएंगे तो इसके जवाब में उन्होंने कहा कि इस संबंध में पिछले चार-पांच महीनों से अध्ययन हो रहा था और दुनियाभर के अर्थशास्त्रियों से बात की गई है.

एक तरफ़ कांग्रेस इसे ऐतिहासिक योजना बता रही है लेकिन वहीं एक अहम सवाल ये बना हुआ है कि इसके लिए संसाधन कहां से जुटाए जाएंगे.

इन्हीं सारे सवालों की पड़ताल के लिए बीबीसी संवाददाता कीर्ति दुबे ने आर्थिकमामलों के जानकार शिशिर सिन्हा से बात की.पढ़िए उन्हीं के शब्दों में-

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राहुल गांधी की घोषणा के संदर्भ में शिशिर कहते हैं कि इस योजना को देखने के दो तरीक़े हो सकते हैं.

पहला तो यह कि जब यूपीए सत्ता में थी तो उन्होंने मनरेगा शुरू किया था. उस वक़्त भी ये कहा गया था कि यह स्कीम बहुत कामयाब नहीं होगी लेकिन एक वक़्त ऐसा भी आया जब इस योजना को गेम-चेंजर कहा जाने लगा. कहा तो ये भी गया कि यूपीए दोबारा जो सत्ता में आई तो इसके पीछे मनरेगा का बहुत बड़ा योगदान था.

अब बात उस योजना की जिसके तहत राहुल गांधी ने सबसे ग़रीब 20 फ़ीसदी लोगों को प्रतिमाह छह हज़ार रुपए दिए जाने का वादा किया है. एक अनुमान के मुताबिक़ ऐसे लोगों की संख्या क़रीब पांच करोड़ के आस-पास है.

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ग़रीब परिवारों को मिलेंगे 72,000 रुपए सालाना, राहुल का दावा

राहुल गांधी की योजना के लिए अगर ख़र्च की बात की जाए तो इसमें क़रीब तीन लाख साठ हज़ार करोड़ रुपए का ख़र्च आएगा. अब अगर साल 2019-20 के बजट को देखें तो यह लगभग 27.84 लाख करोड़ रुपए का होगा. इस लिहाज़ से इस योजना के लिए बजट से लगभग 13 प्रतिशत चाहिए होगा. जीडीपी के हिसाब से यह लगभग दो प्रतिशत बनता है.

यह सुनने में बहुत लुभावना लग रहा है और ऐसा भी लग रहा है कि जिस यूनिवर्सल बेसिक इनकम की बात की जाती रही है ये उसकी शुरुआत है लेकिन ये समझना सबसे ज़रूरी है कि अभी बहुत सी जानकारियां इसमें शामिल नहीं हैं.

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राहुल का दांव

अभी बहुत ही बुनियादी जानकारी आई है और इसके आधार पर सारे निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते हैं लेकिन इस बात से भी मना नहीं किया जा सकता कि कांग्रेस की तरफ़ से दांव खेला गया है.

आर्थिक तौर पर देखें तो इस योजना को लेकर ढेरों सवाल उठ सकते हैं, मसलन पैसे कहां से आएंगे, लेकिन अगर राजनीतिक दृष्टि से देखेंगे तो यह समझ में आता है कि इस तरह की पिछली कई योजनाओं ने वोट दिलाने में मदद की है और हो न हो यह भी कांग्रेस का एक दांव ही है.

इस योजना को मोदी सरकार किसानों के लिए सालाना छह हज़ार रुपए दिए जाने की स्कीम का जवाब भी माना जा रहा है.

भले इसका राजनीतिक पहलू वोट से जुड़ा है लेकिन जो सबसे बड़ा सवाल है वो बिल्कुल तटस्थ है कि आख़िर पैसे कहां से आएंगे.

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मौजूदा समय में केंद्र सरकार 35 तरह की सब्सिडी मुहैया कराती है. इसमें खाने, उर्वरक, पेट्रोलियम से जुड़ी प्रमुख सब्सिडी है. इन सभी सब्सिडी को मिला दिया जाए तो साल 2019-20 के बजट में इसके लिए तीन लाख 34 हज़ार करोड़ रुपए का ख़र्च है.

अब ऐसे में अकेले इस स्कीम का ख़र्च देखें और अर्थशास्त्र के पैमाने पर इसे रखें तो पैमाना कहता है कि अकेले इस स्कीम को रखने के लिए दूसरी सब्सिडी को ख़त्म करनी होगी.

इसे ख़त्म कर देना इतना आसान नहीं क्योंकि समाजिक और राजनीतिक दृष्टि से यह एक बहुत ही संवेदनशील मुद्दा है.

सब्सिडी हटाना चुनौती है

शिशिर कहते हैं कि मौजूदा समय में जिन 35 मदों पर सब्सिडी मिल रही हैं उनका लाभ एक बहुत बड़े वर्ग को होता है जबकि यह स्कीम ग़रीबों में भी सबसे ग़रीब वर्ग तक सीमित है, ऐसे में मुश्किल तो है.

लेकिन अगर बात करें कि ऐसे में यह स्कीम लागू कैसे होगी तो दो ही स्थितियां हैं. एक तो कि कुछ सब्सिडी में फेरबदल, दूसरे ख़र्चों में कटौती और नियमितता.

अमूमन जब सरकारें बदलती हैं तो कुछ पुरानी योजनाएं रोक दी जाती हैं.

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फ़िलहाल, इस सरकार की योजनाओं की बात करें तो प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना पर सबसे ज़्यादा बल दिया जा रहा है. इसका ख़र्च सिर्फ़ छह हज़ार करोड़ रुपए का है और मनरेगा की बात करें तो लगभग साठ हज़ार करोड़ रुपए का ख़र्च है.

ऐसे में सिर्फ़ इन दो योजनाओं के आधार पर ही देख लें तो इस नई स्कीम के लिए पैसा जुटाना मुश्किल हो जाएगा. राजकीय ख़ज़ाने पर इसका बुरा असर पड़ सकता है.

हालांकि शिशिर ये ज़रूर मानते हैं कि अभी कुछ भी कहना जल्दबाज़ी होगी क्योंकि बहुत अधिक ब्यौरा सामने नहीं आया है.

लेकिन मौजूदा गणित के हिसाब से तो आसार यही बनते हैं कि सारी सब्सिडी ख़त्म कर दी जाए और सिर्फ़ यही स्कीम लागू की जाए तो ही यह संभव होगा.

या दूसरा उपाय ये है कि उधारी ज़्यादा की जाए और तीसरा कि टैक्स वसूली बढ़े.

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कहीं न कहीं और किसी न किसी तरह से संतुलन को तलाशना ही पड़ेगा.

कहीं यह सिर्फ़ चुनावी वादा तो नहीं?

जब आम आदमी को आर्थिक मदद की बात की जाती है तो वोटों पर असर पड़ता है. अपने इस तथ्य के लिए वो पिछले लोकसभा चुनाव के पहले बीजेपी द्वारा सबके खाते में 15 लाख रुपए आने की बात करते हैं.

निश्चित तौर पर यह एक बड़ा मुद्दा था जिसने लोगों का ध्यान खींचा. हालांकि बाद में इस पर कई तरह की सफ़ाई भी दी गई. जब आप सत्ता में नहीं होते हैं तो ऐसी बातें करना जोखिम भरा नहीं होता है. लेकिन जब आप सत्ता में आते हैं तो आप सच्चाई से रु-ब-रु होते हैं.

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बात अगर मौजूदा मोदी सरकार के कार्यकाल की करें तो उन्होंने पिछली कई योजनाओं मसलन मनरेगा को जारी रखा. उन्होंने जिन नई योजनाओं को शुरू किया वे योजनाएं हमेशा कुछ शर्तों के साथ आईं, ऐसे में हर किसी को उसका लाभ नहीं मिला. एक वर्ग छूट ही जाता है.

शिशिर मानते हैं कि योजनाओं की घोषणा कर देना बहुत आसान है लेकिन उनका क्रियान्वयन करना उतना ही मुश्किल होता है.

वो कहते हैं कि सत्ता में नहीं होने पर ऐसा करना और आसान होता है लेकिन अगर कांग्रेस सत्ता में आती है और उसकी इस योजना को अमली जामा पहनाया जाता है तो भी यह कई शर्तों और नियमों के साथ ही लागू हो सकेगी.

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