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ओडिशा: फणी तूफ़ान के बाद मछुआरों की उजड़ी ज़िंदगी- ग्राउंड रिपोर्ट

WikiFX
| 2019-05-18 17:04

एब्स्ट्रैक्ट:सहदेव प्रधान ओडिशा में पेंठोकटा के सबसे तजुर्बेकार मछुआरों में से एक हैं, लेकिन आजकल वो सुबह-सुबह मज

सहदेव प्रधान ओडिशा में पेंठोकटा के सबसे तजुर्बेकार मछुआरों में से एक हैं, लेकिन आजकल वो सुबह-सुबह मज़दूरी की तलाश में निकल पड़ते हैं.

''तूफ़ान फणी में हमारा सब हवा में उड़ गया,'' पेंठोकटा मोहल्ले के साइकलोन सेंटर में पत्नी लक्ष्मी के साथ मौजूद सहदेव कभी झुंझलाकर, तो कभी दुख भरी आवाज़ में अपनी दास्तान बयां करते हैं.

लक्ष्मी और सहदेव के पास वैसे भी खोने के लिए था ही क्या! अल्यूमिनियम और स्टील के चंद बर्तन, ईंट, पॉलथीन और एस्बेस्टेस को मिलाकर बनाया गया छोटा सा कमरा. 21 ईंच का वो टीवी जो घर के एक कोने में इन दिनों उपेक्षित सा पड़ा है.

सहदेव के घर से पास मौजूद हिंद महासागर की लहरों का शोर वहां से साफ़ सुनाई देता है.

इन्हीं लहरों ने 200 किलोमीटर से भी तेज़ रफ़्तार से चल रही हवा के साथ मिलकर पेंठोकटा और पुरी के दूसरे इलाक़ों और ओडिशा के 13 अन्य ज़िलों में भारी तबाही मचाई थी.

Image caption सहदेव प्रधान मछुआरों को नुक़सान

समुद्र के किनारे बसे पेंठोकटा को पुलिस ने एक दिन पहले ख़ाली करवा लिया था इसलिए किसी की जान नहीं गई लेकिन मछुआरों को, जिनमें से ज़्यादातर आर्थिक तौर पर कमज़ोर हैं, भारी नुक़सान का सामना करना पड़ा.

स्थानीय लोगों के मुताबिक़ पेंठोकटा में मौजूद कुल 12,000 नावों में से कम से कम दो हज़ार तो पूरी तरह टूट-फूट गईं हैं और बक़ियों को कुछ न कुछ नुक़सान पहुंचा है.

तटीय इलाक़े में बसे ओडिशा में कम से कम छह लाख परिवार मछली पकड़ने के काम में लगे हैं और बताया जा रहा है कि क्षतिग्रस्त नावों की कुल तादाद अनुमानत: 10 हज़ार से अधिक हैं.

राज्य सरकार ने 15 अप्रैल से अगले दो माह तक के लिए बड़े फिशिंग ट्रैवलरों के मछली पकड़ने पर रोक लगा रखी थी, क्योंकि यह मछलियों के अंडे देने का वक़्त होता है.

इस वजह से बहुत सारे मछुआरों की जान बच गई. लेकिन इसी दौरान बहुत सारे मछुआरे बाहर गए हुए थे जिसके चलते उनकी नावें क्षतिग्रस्त हो गईं.

अप्पा राव एक मछुआरे हैं. वो बताते हैं, ''अब हम कम से कम दो महीनों तक मछली नहीं पकड़ पाएंगे, लोगों के पास तब खाने के लिए भी नहीं बचा है.''

मायूस और चोटिल लोग

लोगों की बेकारी के संकेत हर ओर दिखते हैं. थोड़ी-थोड़ी दूर पर ताश या चौपड़ खेलते वयस्कों के गुट, सकरी गलियों के भीतर खाटों पर बातें करते लोग या किसी बात पर जारी बहस, जो हमारी समझ में नहीं आती क्योंकि वो या तो उड़िया भाषा में हो रही हैं या तेलुगू में.

पास में ही बैठी दो महिलाएं हमें अपनी चोट दिखाने लगती हैं. जो हफ़्तेभर बीत जाने के बाद सूखी नहीं, बल्कि एक औरत का पांव तो बुरी तरह सूज गया है.

मैंने लक्ष्मी से पूछा कि वो अपना घर कब तक बनाने की उम्मीद रखती हैं? थोड़ा झुंझलाते हुए लक्ष्मी कहती हैं, ''अनाज ख़रीदने के लिए पैसा नहीं है तो घर कहां से बनाएंगे?''

लक्ष्मी के पति सहदेव उनकी बात पूरी होने से पहले ही बोल पड़ते हैं, ''हमारे पास कोई बैंक बैलेंस नहीं है.''

लक्ष्मी और सहदेव के बेटे जम्बेश्वर प्रधान ने पैसे की तंगी के चलते लाइफ़गार्ड का काम शुरू कर दिया है जहां से उन्हें नौ हज़ार रुपए प्रति माह मिलते हैं.

जम्बेश्वर कहते हैं, ''मछुआरों को लग रहा था कि तूफ़ान बहुत भयंकर नहीं होगा पिछली बार इतनी बर्बादी नहीं हुई थी इसलिए आख़िरी समय तक कोई घर छोड़कर जाने को तैयार नहीं था.''

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Image caption सहदेव की पत्नी लक्ष्मी भविष्य की उम्मीदें

सहदेव हमारे साथ चलते हुए समुद्र के बिलकुल किनारे आ जाते हैं और दूर कहीं देखने लगते हैं, शायद सोच रहे हों कि कब गहरे समुद्र में जा पाएंगे और काम फिर से शुरू होगा.

लेकिन नावों को फिर से तैयार होने और उन्हें समुद्र में ले जाने में ख़ासा वक़्त लगेगा. वो भी तब जब बिजली की सप्लाई बहाल हो पाएगी. कहा जा रहा है बिजली की बहाली में कम से कम महीने भर का वक़्त लगेगा.

मछुआरे गणेश कहते हैं कि बिजली का आना तो नाव तैयार करने की महज एक ज़रूरत भर है लेकिन उससे कहीं ज़्यादा मुश्किल होगा मछुआरों के लिए पैसों का इंतज़ाम कर पाना.

बैंक हमें क़र्ज़ देते नहीं, जिसके चलते हमें महाजन से उधार लेना पड़ेगा और उसे हासिल करना पहले से क़र्ज़ में डूबे हुए किसानों के लिए आसान न होगा.

छोड़िए फ़ेसबुक पोस्ट BBC News हिन्दी

वो परिवार जिसे ओडिशा में फणी तूफ़ान के वक़्त राहत केंद्र में 'घुसने से रोक दिया गया'

वीडियो: फ़ैसल मोहम्मद अली/अंशुल वर्मा

Posted by BBC News हिन्दी on Tuesday, 14 May 2019

पोस्ट फ़ेसबुक समाप्त BBC News हिन्दी

राज्य सरकार ने हाल में क्षतिग्रस्त हुई नावों के लिए तक़रीबन दस हज़ार और जाल के लिए 2600 रुपए मुआवज़े का ऐलान किया है लेकिन मछुआरों का कहना है कि यह मदद ऊंट के मुंह में ज़ीरे के समान है.

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